भारतीय सेना ने रानीखेत में “साझा हिमालयी विरासत” पर संगोष्ठी का आयोजन किया

हर काम देश के नाम’

 

भारतीय सेना ने रानीखेत में “साझा हिमालयी विरासत” पर संगोष्ठी का आयोजन किया

 

रानीखेत

 

भारतीय सेना की सेंट्रल कमान ने रानीखेत के कुमाऊं रेजिमेंटल सेंटर में “इंटरवोवन रूट्स: शेयरड हिमालयन हेरिटेज” नाम से एक दिन की खास संगोष्ठी आयोजित की। इस कार्यक्रम में सेना के वरिष्ठ अधिकारी, विद्वान, राजनयिक और सुरक्षा विशेषज्ञ शामिल हुए। इसका मकसद था हिमालयी इलाकों की साझा संस्कृति और सभ्यता को समझना और ये देखना कि इसका हमारे सीमावर्ती इलाकों की सुरक्षा पर क्या असर पड़ता है।

इस मौके पर बताया गया कि भारत और उसके पहाड़ी पड़ोसियों के बीच रिश्ता सिर्फ सीमाओं का नहीं है, बल्कि ये सदियों पुरानी आध्यात्मिक, सांस्कृतिक और व्यापारिक जुड़ाव पर भी टिका है। पुराने तीर्थ रास्तों, हिमालय पार व्यापार, नदियों और रीति-रिवाज़ों ने हमेशा हमें जोड़े रखा है। आज जब सीमाओं की निगरानी और सहयोग की बात होती है, तो इस सांस्कृतिक समझ की अहमियत और भी बढ़ जाती है।

सेना की सेंट्रल कमान के जनरल ऑफिसर कमांडिंग-इन-चीफ लेफ्टिनेंट जनरल अनिंद्य सेनगुप्ता ने अपने भाषण में कहा कि रणनीति बनाते वक्त हमारी सांस्कृतिक और सभ्यतागत समझ भी उतनी ही जरूरी है। उन्होंने कहा कि सरहदों की रक्षा करना सिर्फ फौजी ताकत का काम नहीं, हमें उन इलाकों की परंपरा और पहचान को भी बचाकर रखना चाहिए।

 

इस संगोष्ठी में डॉ. माया जोशी, मेजर जनरल एस.बी. अस्थाना (सेनि), प्रो. अनिल जोशी, डॉ. मेधा बिस्ट और कई अन्य विशेषज्ञों ने अपने विचार रखे। विषयों में बौद्ध संस्कृति, पारवर्ती व्यापार, जल कूटनीति और संस्कृति पर फोटो प्रस्तुतियाँ शामिल रहीं। कार्यक्रम का संचालन ब्रिगेडियर रूमेल डहिया (सेनि) ने किया।

 

समापन पर लेफ्टिनेंट जनरल डी.जी. मिश्रा, जीओसी उत्तर भारत क्षेत्र ने कहा कि देश की सीमाओं की सुरक्षा सिर्फ हथियारों से नहीं, बल्कि सोच और समझ से होती है। उन्होंने वक्ताओं का धन्यवाद किया और सेना की इस पहल को सांस्कृतिक और रणनीतिक सोच का बेहतरी न मेल बताया।

 

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